Thursday, 6 October 2022

वृद्धि सन्धि:

 वृद्धि सन्धि 

परिभाषा :- यदि " अ / आ " के पश्चात् " ए / ऐ " और " ओ /औ " हो तो पूर्व - पर वर्णों के स्थान पर क्रमशः " ऐ " और " औ " आदेश होगा | 

सूत्र :- वृद्धिरेचि | 

अ / आ + ए / ऐ     = ऐ 

अ / आ + ओ / औ = औ 

उदाहरण :- 

अत्र +एक:        =  अत्रैक: 

पश्य + एतत्      =  पश्यैतत् 

सा + ऐषा          =  सैषा 

राज + एश्वर्यम्    =  राजैश्वर्यम् 

तंदुल + ओदनम् =  तण्डुलौदनम् 

महा + औषधि:   =  महौषधि: 

देव + ओदार्यम्   =  देवौदार्यम् 

एक + एक         =  एकैक: 

सदा + एव         =  सदैव: 

कृष्ण + एकत्वम् =  कृष्णैकत्वम् 

देव + ऐश्वर्यम्     =  देवैश्वर्यम् 

महा +ऐश्वर्यम्     =  महैश्वर्यम् 

गंगा + ओघ:      =  गंगौघ: 

न + ऐतत्           =  नैतत् 

मत + ऐक्य:       =  मतैक्य: 

तदा + एव          =  तदैव: 

अद्य + एव          =  अद्यैव 

जन + एकता      =  जनैकता 

तत्र + एकता       =  तत्रैकता 

मम + औषधि:    =  ममौषधि: 

तव + ओष्ठ:        =  तवौष्ठम् 

यथा + औचित्यम् = यथौचित्यम् 

Wednesday, 5 October 2022

गुण सन्धि:

 गुण सन्धि 

परिभाषा :- यदि " अ / आ " के पश्चात् हृस्व / दीर्घ " इ , उ , ऋ , लृ " हो तो पूर्व - पर वर्णों के स्थान पर क्रमशः " ए , ओ , अर् , अल् " आदेश होता है | ( अर्थात्  ए , ओ , अर् , अल् को गुण कहा जाता है )

सूत्र : " आद् गुण: " |

अ /आ   +  इ / ई     =  ए 
अ / आ  +  उ / ऊ    =  ओ 
अ / आ  +  ऋ / ॠ  =  अर् 
अ / आ  +  लृ           =  अल् 

उदाहरण :-  

रमा   +  ईश: =     रमेश: ( अ + ई = ए ) 

गंगा  +  उदकम् =  गंगोदकम् ( आ + उ = ओ ) 

हित  +  उपदेश: = हितोपदेश: ( अ + उ = ओ ) 

महा  +  ऋषि =     महर्षि:  ( आ + ऋ = अर् ) 

तव   +  लृकार: =  तवल्कार: ( अ + लृ = अल् ) 

यहाँ पर बहुत ही आसान तरीके से समझाया गया है एक बार क्लिक कीजिये :-

धन   +  इन्द्र:    =  धनेन्द्र: 

उप   +  इन्द्र:    =   उपेन्द्र: 

पुष्प  +  इन्द्र:    =  पुष्पेन्द्र: 

गज   +  इन्द्र:    =  गजेन्द्र: 

सुर    +  इन्द्र:    =  सुरेन्द्र: 

दिन   +  ईश:     =  दिनेश: 

राम   +  ईश्वर:    =  रामेश्वर: 

नर    +  ईश:      =  नरेश: 

सूर्य   +  उदय:    =  सूर्योदय: 

महा  +  उत्सव:  =  महोत्सव: 

महा  +  ऊर्मि:    =  महोर्मि: 

नव   +  ऊढा      =  नवोढ़ा 

पुरुष +  उत्तम:    =  पुरुषोत्तम: 

यथा  +  उक्तम्    =  यथोक्तम् 

चंद्र   +  उदय:     =  चन्द्रोदय: 

पर    +  उपकार: =  परोपकार: 

सप्त +  ऋषि:     =  सप्तर्षि: 

महा +  ऋषि:      =  महर्षि: 

देव  +  ऋषि:      =  देवर्षि: 

विशेष :- यहाँ पर " अ / आ + ऋ = अर् होता है प्रथम शब्द का अंतिम स्वर और अगले शब्द का पहला स्वर मिलकर '' अर् '' होता है तथा '' अर् '' का '' र् '' हलन्त होता है अतः '' र् '' अगले वर्ण के ऊपर चला जाता है |  

राजा  +  ऋषि:     = राजर्षि: 

ब्रह्म   +  ऋषि:     = ब्रह्मर्षि: 

वर्षा   +  ऋतु:      = वर्षर्तु: 

ग्रीष्म  +  ऋतु:     = ग्रीष्मर्तु: 

शीत   +  ऋतु:     = शीतर्तु: 

वसंत  +  ऋतु:     = वसन्तर्तु: 

महा    +  लृकार:  = महल्कार: 

माला  +  लृकार:  = मालल्कार: 

मम    +  लृकार:  = ममल्कार: 

नव    +  लृकार:  = नवल्कार: 

Tuesday, 4 October 2022

दीर्घ सन्धि:

 दीर्घ संधि 

परिभाषा :-  यदि पूर्व पदान्त हृस्व / दीर्घ अ , इ ,उ , ऋ , के पश्चात कोई सजातीय वर्ण हो तो पूर्व -पर वर्णों के स्थान पर क्रमशः आ , ई , ऊ , ऋ आदेश होगा | 

सूत्र :- अक: सवर्णे दीर्घ: |  

अ  +  अ = आ          इ + इ = ई 

अ  + आ = आ          इ + ई = ई 

आ +  अ = आ          ई + इ = ई 

आ + आ = आ          ई + ई = ई 


उ  + उ  = ऊ             ऋ + ऋ = ॠ

उ  + ऊ = ऊ             ऋ + ॠ = ॠ 

ऊ + उ  = ऊ             ॠ + ऋ = ॠ 

ऊ + ऊ = ऊ             ॠ + ॠ = ॠ 

उदाहरण :- 

हिम     + अंशु:     =   हिमांशु: 

परम    + आनंद:  = परमानन्द: 

शिक्षा   + अर्थी     = शिक्षार्थी 

दैत्य     + अरि:     = दैत्यारि: 

विद्या   + आलय:  = विद्यालय: 

दया     + आनन्द: = दयानन्द: 

सत्य    +  अर्थी     = सत्यार्थी 

न        +  अस्ति    = नास्ति 

हिम    + आलय:   = हिमालय: 

प्रधान + आचार्य:  = प्रधानाचार्य: 

श्री     +   ईश:      = श्रीश: 

कपि  +   ईश:      = कपीश: 

रवी    +   इन्द्र:     = रवीन्द्र: 

हरि    +   ईश:      = हरीश: 

गिरि   +  इन्द्र       = गिरीन्द्र: 

सति   +  ईश:       = सतीश: 

मुनि   +  इन्द्र:      = मुनीन्द्र: 

रजनी +  ईश:       = रजनीश: 

शची   +  इन्द्र:      = शचीन्द्र: 

विष्णु  +  उदय:     = विष्णूदय: 

गुरु     +  उपदेश:  = गुरूपदेश: 

वधू     +  उत्सव:   = वधूत्सव: 

लघु    +  उत्तरम्    = लघूत्तरम् 

साधु   +  इक्तम्     = साधूक्तम् 

सु       +  उक्ति:     = सूक्ति: 

भानू   +  उदय:     = भानूदय: 

पितृ    +  ऋकार:  = पितॄकार:

पितृ    +  ऋणम्    = पितॄणम् 

मातृ    +  ऋकार:  = मातॄकार: 

मातृ    +  ऋणम्   = मातॄणम् 

संधि की परिभाषा व भेद

                                                 सन्धि                                      

संधि शब्द की व्युत्पत्ति :-  " सम् " उपसर्ग पूर्वक " डुधाञ् " (धा ) धातु के " कि " (उपसर्गे धो: कि ) प्रत्यय का प्रयोग करने से  " संधि " शब्द की व्युत्पत्ति होती है | 

संधि की परिभाषा :- " वर्णसंधानं संधि: " | संधानम् = मेलनम् | अर्थात् दो वर्णो के मेल को संधि कहते है | 

महर्षि पाणिनि के अनुसार परिभाषा :- " पर: सन्निकर्ष: संहिता " अर्थात् वर्णों के अत्यन्त सामिप्यता को संधि कहते हैं | 


सामान्य परिभाषा :- दो वर्णो के मेल से उत्पन्न विकार को संधि कहते हैं | 

संधि के प्रकार :- संधि तीन प्रकार की होती है - 1. स्वर संधि ( अच् संधि ) , 2. व्यञ्जन संधि ( हल् संधि ) , 3. विसर्ग संधि | 

1. स्वर संधि 

परिभाषा :- दो स्वरों के मेल से उत्पन्न विकार को स्वर संधि कहते हैं | 

भेद :- स्वर संधि के मुख्यतया पांच भेद होते हैं तथा तीन अवान्तर भेद होते है :- 1. दीर्घ , 2. गुण , 3. वृद्धि , 4. यण् , 5. अयादि | इनके अलावा 6. पूर्वरूप , 7. पररूप , 8. प्रकृति भाव | 

2. व्यञ्जन संधि 

परिभाषा :- दो व्यंजनों के मेल से या एक व्यंजन और स्वर के मेल से उत्पन्न विकार को व्यंजन संधि कहते हैं | 

भेद :- व्यंजन संधि के कोई निश्चित भेदों की संख्या नहीं होती हैं :- श्चुत्व , ष्टुत्व , जशत्व , चर्त्व , अनुनासिक , पूर्वसवर्ण , परसवर्ण , अनुस्वार , ङमुडागम , तुगागम , छत्व इत्यादि | 

3. विसर्ग संधि 

परिभाषा :- स्वर या व्यंजन के प्रभाव से विसर्ग में जो परिवर्तन होता है तो उसे विसर्ग संधि कहते हैं | 

भेद :- विसर्ग संधि के कोई निश्चित भेदों की संख्या नहीं होती हैं :- सत्व , रुत्व ,उत्व , विसर्ग लोप इत्यादि | 

                     सन्धि 

       __________|________________

      |                |                            |                                                              

 स्वर संधि           व्यञ्जन संधि          विसर्ग संधि 

1. दीर्घ               1. श्चुत्व                1. सत्व 

2. गुण                2. ष्टुत्व                2. रुत्व 

3. वृद्धि               3. जशत्व             3. उत्व 

4. यण्                4. चर्त्व                4. विसर्ग लोप   

5. अयादि            5. अनुनासिक 

6. पूर्वरूप           6. पूर्वसवर्ण 

7. पररूप           7. परसवर्ण 

8.प्रकृति भाव       8. अनुस्वार 

                         9. ङमुडागम 

                        10. तुगागम 

                        11. छत्व 


Monday, 3 October 2022

क्तवतु प्रत्यय

  क्तवतु प्रत्यय:

* क्तवतु प्रत्यय कृदंत प्रत्यय कहलाता है |

* क्तवतु प्रत्यय का प्रयोग भूतकाल अर्थ में किया जाता है | 

* क्तवतु  प्रत्यय का प्रयोग सर्वदा कर्तृवाच्य में ही किया जाता है | 

* इस प्रत्यय में प्रारम्भिक '' क् '' और अंतिम '' उ '' का लोप होकर " तवत् " शेष रहता है | 

* इस प्रत्यय के रूप तीनों लिंगो में चलते है | ( भवत् के समान ) 

  Examples :- 

धातु     प्रत्यय        पुल्लिंग         स्त्रीलिंग     नपुंसकलिंग 

पठ्   +   क्तवतु  =   पठितवान्   पठितवती    पठितवत्  

स्ना   +   क्तवतु  =   स्नातवान्    स्नातवती     स्नातवत् 

पा     +   क्तवतु  =  पीतवान्      पीतवती       पीतवत् 

त्यज्  +   क्तवतु  =  त्यक्तवान्     त्यक्तवती     त्यक्तवत् 

शृ      +   क्तवतु  =  शीर्णवान्     शीर्णवती      शीर्णवत् 

छिद्   +   क्तवतु  =  छिन्नवान्     छिन्नवती      छिन्नवत् 

गम्    +   क्तवतु  = गतवान्        गतवती        गतवत् 

दृश्    +   क्तवतु  =  दृष्टवान्       दृष्टवती        दृष्वत् 

नी      +   क्तवतु  =  नीतवान्      नीतवती      नीतवत् 

हन्     +   क्तवतु  =  हतवान्       हतवती        हतवत् 

कृ      +   क्तवतु  =  कृतवान्       कृतवती      कृतवत् 

भाष्   +   क्तवतु  =  भाषितवान्  भाषितवती  भाषितवत् 

ताड्    +   क्तवतु  =  ताडितवान्   ताडितवती  ताडितवत् 

श्रु      +    क्तवतु  =  श्रुतवान्       श्रुतवती      श्रुतवत् 

वच्     +   क्तवतु  =  उक्तवान्       उक्तवती     उक्तवत् 

वद्      +   क्तवतु  =  उदितवान्    उदितवती   उदितवत् 

वस्     +   क्तवतु  =  उषितवान्    उषितवती   उषितवत् 

वह्      +   क्तवतु  =  ऊढवान्      ऊढवती      ऊढवत् 

स्था     +   क्तवतु  = स्थितवान्     स्थितवती   स्थितवत् 

 दा      +   क्तवतु  =  दत्तवान्       दत्तवती      दत्तवत् 

भू        +   क्तवतु  =  भूतवान्      भूतवती     भूतवत् 

रच्      +   क्तवतु  =  रचितवान्    रचितवती   रचितवत् 

रक्ष्      +   क्तवतु  =  रक्षितवान्    रक्षितवती  रक्षितवत् 


ठक् प्रत्यय , Thak pratyay

 ठक् प्रत्यय

* ठक् प्रत्यय तद्धित् प्रत्यय कहलाता है क्योंकि इसका प्रयोग शब्द के साथ किया जाता है | 

* इस प्रत्यय का प्रयोग भाववाचक संज्ञा और विशेषण के रूप में किया जाता है | 

* इस प्रत्यय का प्रयोग होते समय " ठक् " को " इक " हो जाता है | 

* इस प्रत्यय का प्रयोग होने पर शब्द के प्रारंभिक स्वर को वृद्धि आदेश होता है अर्थात् को , इ / ई / ए को , उ / ऊ / ओ को तथा को आर् आदेश हो जाता है | 

* इस प्रत्यय के रूप तीनो लिंगो में चलते है :- पुल्लिंग ( बालक की तरह ) , स्त्रीलिंग ( नदी की तरह ) , नपुंसकलिंग ( फल की तरह ) 

 भूत + ठक्  = भौतिक: ( पुल्लिंग ) भौतिकी ( स्त्रीलिंग )  भौतिकम् ( नपुंसकलिंग ) 

यहां पर समझाया गया है एक बार क्लिक करके देखो :-

उदाहरण :- 
शब्द           प्रत्यय

अस्ति     +  ठक्  =  आस्तिक  

भूत        +  ठक्  =  भौतिक 

वर्ष         +  ठक्  =  वार्षिक 

नगर       +  ठक्  =  नागरिक 

समाज    +  ठक्  =  सामाजिक 

इतिहास  +  ठक्  =  ऐतिहासिक 

उद्योग     +  ठक्  =  औद्योगिक 

दिन        +  ठक्  =  दैनिक 

धर्म         +  ठक्  =  धार्मिक 

सप्ताह    +  ठक्  =  साप्ताहिक 

दर्शन      +  ठक्  =  दार्शनिक 

अर्थ        +  ठक्  =  आर्थिक 

संस्कृत    +  ठक्  =  सांस्कृतिक 

मास        +  ठक्  =  मासिक 

लोक       +  ठक्  =  लौकिक 

पुराण      +  ठक्  =  पौराणिक 

व्यवहार   +  ठक्  =  व्यावहारिक 

प्रमाण     +  ठक्  =  प्रामाणिक 

प्रथम       +  ठक्  =  प्राथमिक 

वेद          +  ठक्  =  वैदिक 

कृति        +  ठक्  =  कार्तिक 

सर्वभूमि   +  ठक्  =  सार्वभौमिक ( यहाँ पर " सर्व "और " भूमि " दो शब्द है इसलिए दोनो शब्दो के प्रथम स्वर को वृद्धि होगी अर्थात् सर्व को " सार्व "और भूमि को " भौमि " ) 

विद्या आधारित श्लोक

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